शनिवार, 20 अगस्त 2016

"माँ की रसोई"


एक समय था, जब माँ की रसोई से तवे पर सिंकते उतरते गरमागरम फुल्कों की सुगंध, दसों दिशाओं को महका देती । भला हम, जन्म से खवैय्ये, भूखे कह लो, कैसे इस सुगंध से निर्लिप्त रह पाते ? बल्कि कई बार तो खाना तैयार होने से पहले ही, मैं पहुँच जाता माँ की रसोई में ।

"ऐ, अभी समय है....चल... !!!", .....माँ भगा देतीं ।

फिर जब कभी, बैंगन का भरता, मूली की कढी या बडी-पानसी अथवा दाल-पानसी बनाई जाती, मैं पूरी खुन्नस निकालता । यहाँ मैं बता दूं, पानसी माने चने के हरे, कंवले पत्तों की भाजी । बनी हुई सब्जी या कढी-दाल, आधी से अधिक, उदरस्थ करने पर माँ झुंझला कर पूरा पात्र मेरे सामने पटक देतीं ;

"ले...तू ही खा ले, और तो कोई है नहीं खाने वाला.....!!!"

... झुंझलाहट के साथ साथ, अपने शरीर से बढते पुत्र के लिए कौतुक भी होता उसकी आंखों में जो पत्नी की आंखों में, सौ कोशिशों के बावजूद, कभी नहीं दिखा मुझे । 

माँ की रसोई व उस रसोई की सुगंध, अब भी, वैसी ही ताज़ा है मेरी स्मृति में और कदाचित मेरी अंतिम सांस तक रहे....

- सत्येन भंडारी

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